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Bridge Over River Ganga: Allahabad - इलाहाबाद: गंगा नदी पर पुल

October 15, 2007 · No Comments

गंगा नदी पर बना यह पुल सड़क मार्ग (इलाहाबाद-बनारस) द्वारा इलाहाबाद (शहर) को झूँसी से जोड़ता है, जिसको शास्त्री पुल नाम से भी जाना जाता है, शहर की ओर ये मिन्टो-पार्क के पास से प्रारम्भ होता है।

Shashtri Bridge Over Ganga River in Allahabad

नीचे की तस्वीर गंगा नदी पर ही बने रेलवे पुल की है जो इलाहाबाद सिटी स्टेशन (दारागंज होते हुए) को झूँसी से जोड़ता है, इलाहाबाद-वाराणसी (बनारस) लाइन

Rail Bridge over Ganga

दोनो चित्र शिवगंगा एक्सप्रेस के आखिरी डिब्बे (गार्ड केबिन) से लिये गये थे, जब मै ९ अगस्त २००७ को वाराणसी गया था। आखिरी डिब्बे के पीछे की ओर लगा कांच इतना गन्दा न होता तो ऊपर की तस्वीर और अच्छी लगती।

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Atlantis Landing NASA Stream Video

June 23, 2007 · No Comments

आज रात अटलांटिस के धरती पर पहुँचने से लगभग १० मिनट पहले शुरू होता है पहला विडियो और १० मिनट से कुछ अधिक अवधि का है।

इस विडियो को  एक MMS Stream Recorder  की सहायता से रेकॉर्ड करके यू ट्यूब पर अपलोड किया।

अट्लांटिस ग्रीनविच मानक समय के अनुसार २२ जून २००७ को शाम के ८ बजकर ४९ पर पृथ्वी पर उतरा। उसके बाद का लगभग बीस मिनट तक का दृश्य पहले विडियो मे है।

http://www.youtube.com/watch?v=CmFisT05Xmk

दूसरे विडियो मे उतरने के २० मिनट के बाद का दृश्य है। तत्पश्चात जब अन्तरिक्ष यात्रियों को यान से बाहर निकाला जा रहा था तो live stream  के स्थान पर रेकार्डिन्ग दिखायी जाती रही।

एम एम एस स्ट्रीम की लिन्क के लिये नीरज दीवान को धन्यवाद एवं आभार।

http://www.youtube.com/watch?v=aBCA9GpGZ5I

इससे सम्बन्धित तस्वीरें यहाँ पर देखी जा सकती हैं।

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कभी यादों मे आऊँ…कभी ख्वाबों मे आऊँ…एक सुहाना सफ़र।

June 13, 2007 · 1 Comment

कुछ विडियो बनाये थे पिछले दिनों, अब YouTube  पर डालकर यहाँ लगा रहा हूँ।

Camerino to Civitanova Marche, Italy

 ये विडियो कामेरिनो से निकलते हुए, SS 77 तक पहुंचने के समय का है।

Camerino to SS 77

विडियो अपने डिजिटल कैमरे से ही बनाया है इस लिये गुणवत्ता साधारण है, शोर के बावजूद गीत अच्छा लगता है।

विडियो देखने के लिये यहाँ पर क्लिक करें।

 अवधि १८८ सेकेंड, अगर किसी को डाउनलोड करके देखने की इच्छा हो तो सूचित करें।

Categories: Travel

वापस इट्ली मे

January 2, 2006 · No Comments

मित्रों मै अब वापस इटली आ गया हू, मुझे कुछ टिप्पणियां मिली जिनमे सुनील जी के बारे मे बताया गया, इस सन्दर्भ मे मै कहना चाहूंगा कि मेरा उनसे सम्पर्क पिछ्ले महीने हो चुका है, और मै भी उनके ब्लाग का नियमित पाठक हू|

आप सबको नव वर्ष की शुभकामनायें | मेरा हैप्पी न्यू इयर तो बस मे ही हो गया (मनाया) था, वो इस लिये कि मै 31 की सुबह ग्रीनोबल से चला था, सुबह 4:30 पर मै और डा पाठक रेलवे स्टेशन के लिये चले, रात को भारी हिमपात हुआ था और हमें अपनी ट्रालियों को घसीटने मे …. याद आ रही थी: वही हिम और हिमपात जो कल रात को यहां के भारतीय होटल से रात का खाना खाकर वापस आते समय रोमांचक लग रही थी| आखिर हम 1 किलोमीटर चलकर गार(स्टेशन) पहुंचे, पाठक जी खुश थे कि उनकी ट्रेन सही समय से है जिससे  फ्लाइट मिस नही होगी| मुझे यहा से शाम्ब्री जाने के लिये 10 बजे तक तीन गाडिया थी और वहा से मुझे 10:58 पर मिलान के लिये जाना था, फिर भी मैने सात बजे वाली सवारी की और आठ बजे शाम्ब्री आ गया, ठन्ड बहुत थी मैने स्वयँ को कवर किया और स्टेशन के बाहर निकल गया, मेरे पास घूमने का समय तो था लेकिन -5 डिग्री का बाहरी तापमान और Ice बन गयी snow पर टहलना आसान नही था इसलिये मै एक बार मे घुस गया जहा गरमा गरम काफी पी, चिप्स खाये और आधे घंटे बैठकर वापस स्टेशन के प्रतीक्षालय मे ही बाकी की प्रतीक्षा की| यहा से टी ज़ी वी पर बैठना था जो पेरिस से मिलान के मार्ग पर चल रही थी यूरो सिटी नाम से, सामान आदि रखने के बाद मैने समय बिताने के लिये अपने लैपटाप पर फिल्म लगा ली, वही जो डा शशांक ने लियान मे मुझे दी थी और बताया था कि अमेरिकन क्लासिकल फिल्म इतिहास मे इसको एक तरफ और बाकी सब को एक तरफ करके तुलना होती है, और जिसका नाम है, Gone With The Windयह 4 घंटे की फिल्म है जिसका पहला भाग मैने लियान से आते समय देखना प्रारम्भ किया था| 2:45 पर मिलान का समय था लेकिन यह पहले से ही 15 मिनट लेट थी फिर हम 3 बजे मिलान मे थे, यहा भी काफी बरफ थी और वायु मे गलन, मै बाहर निकला तो इस बार दूसरी तरफ चला गया और एक ऐसी दुकान मे जा पहुंचा जहां मेरे लिये कुछ उष्ण कटिबन्धीय खाद्य पदार्थ उपलब्ध थे, मैने 5-6 किलो सामान खरीद लिया|

यहा से 17:10 पर ट्रेन थी, रुचिकर मसला ये हुआ कि जिस डिब्बे मे मेरा आरक्षण था, उसके साथ कुछ समस्या थी जिसका निदान करते करते ट्रेन 15 मिनट लेट हो गयी पर समाधान न मिला, सो उसमे न ही प्रकाश रहा और न उचित तापमान, अतः कैरोत्सा (डिब्बा) बदलना पडा, 21:30 पर फैल्कोनारा मे दूसरी ट्रेन ली उससे फैब्रियानो पहुंचे जहा से वो बस ली जिसने कैसल्रायमोन्दो पहुंचाया यहा बस बदली और अपने घर के पास उतरे रात के 00:30 पर|

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ग्रीनोबल (फ्रांस) यात्रा

December 26, 2005 · No Comments

24 तारीख की सुबह मै साढे पांच बजे कैमेरिनो से ग्रीनोबल जाने के लिये निकला, यह एक बहु चरणीय यात्रा थी सबसे पहले कैमेरिनो से बस द्वारा कस्त्लेरऐमोन्दो 6:05 पहुंचे, वहा से अल्बाचिनो 6:40, फिर फल्कोनारा 7:53 उसके बाद बोलोन्या, 10:22 पर अगली ट्रेन मिलान के लिये थी 11:35 पर मेरे पास एक घंटे का समय था तो मैने वही साथ लाया हुआ ब्रेड बटर और मैक डोनाल्ड से फ्रेंच फ्राई और कोक लेकर खाना खा लिया| जब प्लेट्फार्म पर पहुंचे तो पता चला कि वो ट्रेन 3 घंटे लेट है, मेरी अगली ट्रेन मिलान से ग़्रेनोब्ले के लिये 4:13 शाम को थी, मेरे पास समय भी था और एक यूरोस्टार 12:16 पर जाने वाली थी जो 2 बजे पहुंचाती, मैने टिकट बदलवाया, 12.60 यूरो अतिरिक्त देकर; और सौभाग्य या दुर्भाग्य से ये भी 15 मिनट ही लेट थी,इस प्रकार मै 2:10 पर मिलान आ पहुंचा, अब मेरी तमन्ना थी मिलान का विश्व प्रसिद्ध चर्च देखने की मेरे पास दो घंटे का समय था| मैने अपनी इटालियन भाषा ज्ञान का उपयोग करते हुए, वहा तक पहुंचने का तरीका मालूम किया और पीले लाइन की ट्राम से दुओमो (चर्च) तक पहुंच गये, नज़ारा वाकयी भव्य था लेकिन ढका हुआ क्योंकि कुछ मरम्मत का कार्य ज़ारी था सामने की तरफ से, फिर भी मैने तस्वीरे ली, चारो तरफ से घूमकर देखा, बाज़ार भी और समय से स्टेशन भी वापस आ गये, इस बीच घर फोन भी किया और बताया कि फ्रांस जा रहा हू, ट्रेन पर बैठने के उपरांत मैने पाठक जी को भी फोन किया जिनके पास मै वहा एक सप्ताह रहूंगा, वो सप्ताहांत को भारत के लिये प्रस्थान कर रहे है| ये वही फ्रांस की मशहूर टी. जी. वी.थी जिसकी तेज गति के बारे मे मै कई बार पढ चुका था, लेकिन जब यह एक स्टेशन पर 15 मिनट के लिये ठहरी तो मै चिंतित हो गया क्योंकि मेरे यात्रा की आखिरी ट्रेन शम्ब्री से ग्रेनोब्ले के लिये 8:11 पर थी और इसको 7:56 पर वहा पहुंचना था, और पहुंची भी लेकिन 8:08 पर और मै ट्रेन पकड्ने के लिये दौडा, मुझे प्लेटफोर्म भी ढूंढ्ना था, अंततः मै समय रहते ट्रेन मे दाखिल हो गया, वहा एक वियतनामी बालिका ने मेरी सहायता की|
मै ग्रीनोबल पर उतरा और चिन्हो का पीछा करते हुये, निकास की और बढे, और भूतल (बाकी का मार्ग भूमिगत है) पर पहुंचते ही पाठक जी सामने से आते दिखायी दिये| 15 मिनट में मैं उनके छठे तल पर स्थित निवास पर पहुंच चुका था|
सब कुछ बढिया और व्यवस्थित था, समस्या एक ही थी, कि थी ही नही, हम लोगो ने साथ खाना खाया और बहुत सी बातें कीं,और फिर वे रात के लिये थोडी दूर स्थित सुशील जी के यहां चले गये, मै थकान अनुभव तो नही कर रहा था पर एक बार नीन्द लगी तो सुबह 6 बजे ही जागे|
सुबह 8 बजे पाठक जी आये उसके बाद पौने दस बजे हम लोग बाहर निकले उनको उनिवेर्सित्य जाना था वहा का सब काम निपटाने, बोले कि लंच में वापस आऊंगा फिर साथ चलेंगे| वे चले गये मै घूमता रहा, मौसम बहुत ठंडा था, मेरे पास ग्लोवेस भी नही थे, 30-40 मिनट बाद मै चर्च के अन्दर भी गया वहा इसाइयों के धर्मगुरू का व्याख्यान चल रहा था कुछ कुछ विशिष्ट प्रकार की ध्वनियों से सुसज्जित. बाहर का तापमान शून्य के पास ही रहा होगा, इसलिये मै वापस आ गया और कुछ पत्रिकाए पढ्ने लगा| 11:30 के लगभग पाठक जी ने फोन किया कि वे लंच मे नही आ पाएंगे, पूछने पर कहा कि 3 बजे तक, 2 बजे मैने कल का रखा दाल चावल खाया और कुछ देर अपने तोशिबा के साथ बिताने के बाद मै लेट गया, सोचा वे आयेंगे तभी उठेंगे, पर वे नही आये मै 6:30 पर उठा और बाहर गया एक दुकान से इंटर्नेट से सन्युक्त होकर ई मेल चेक किये, कल डा त्रिपाठी का जन्म दिन था उन्होने मेरी शुभ्काम्नाओं के लिये धन्यवाद भेजा था| जरमनी और कनाडा से भी एक एक मेल था मैन जब घंटे भर बाद लौटा तो पाठ्क जी मौजूद थे|

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हमारी रोम यात्रा

December 20, 2005 · No Comments

हमारी रोम यात्रा,
प्रो सरताज पिछ्ले कई हफ्तो से कह रहे थे इस हफ्ते रोम चलेंगे तो आखिर मै ने भी सोच लिया कि ठीक है इस हफ्ते रोम चलते है, वैसे भी अकेले जाने से अच्छा है कब तक किसी पसन्दीदा शख्श का इंतज़ार करते रहेंगे, वैसे जब मै इटली आया था जनवरी 2005 मे मुझे एक आमंत्रण मिला था, जिसे मैने नासमझी के चलते ठुकरा दिया था, उसके बाद से एक बार मौका मिला जब अगस्त मे भारत जा रहा था, पर उस बार सामान भी काफी था और समय कम
तो हम ने योजना बनायी कि शनिवार को सुबह कमेरिनो से चलेंगे और उसी दिन शाम को वापस आ जायेंगे,

मुझे शनिवार को देर तक सोने की आदत है, और ये आदत पिछ्ले पांच सालों से है, सो शुक्रवार शाम को टिकट ले आये, सुबह 06:35 पर पास के बस स्टेशन से बस लेनी थी उसके बाद कस्तेल्रैमोन्दो
से फब्रिआनो

के लिये ट्रेन और फिर वहां से 8 बजे यूरोस्टार ट्रेन,
मुश्किल से रात कटी कि कहीं सोते ही न रह जायें, और हम 15 मिनट पहले बस स्टाप पर पहुंच गये, खैर सफर शुरू हुआ और खतम भी, इस प्रकार हम
पौने ग्यारह बजे रोमा तर्मिनी
पर उतरे सबसे पहले पता लगाया कि वेटिकन सिटी कैसे पहुंचा जाये, अंततः एक ट्रेनिटालिया स्टाफ से मुलकात हुई और सौभाग्य से वे अंग्रेजी समझ सकती थीं, उन्होनें बताया कि मेट्रो की लाल रंग वाली लाइन ऍ
से हमे जाना है और ओत्ताविएनो स्टेशन पर उतरकर हम वहां पहुच सकते हैं,

वेटिकन सिटी दुनिया का सबसे छोटा देश होने का गौरव रखता है, यह इटली की राजधानी रोम के अन्दर स्थित है और इसकी मुख्य पहचान इसके केन्द्र मे स्थित सैन पियेत्रो नाम के भव्य आहाते से है, जहा लाखो की संख्या मे इसाई समुदाय के लोग एकत्र होकर अपने धर्मगुरू पोप का विशिष्ट अवसरों पर दिया जाने वाला व्याख्यान सुनने आते है

ओत्ताविएनो से सन पियेत्रो पहुंचने के दौरान हम जब रास्ते से गुजर रहे थे तो हमने देखा कि कुछ लोगो ने सोलहवी सदी के वस्त्र धारण किये हुये हैं, और एक कमान्डर उनको हिदायतें दे रहा है, मेरी आंखो के सामने अचानक कहानियो वाले रोम और उसकी सेनाओं का दृश्य जागृत हो आया, बहुत से सैलानी इस दृश्य को अपनो कैमरो मे कैद कर रहे थे तो कुछ वीडियो भी रेकोर्ड कर रहे थे

तभी मेरी नज़र इस चहल पहल से दूर अपनी बायीं तरफ गयी वहा एक खंड्हर सा दिखायी पडा
पहले तो मुझे थोडा अजीब लगा फिर सोचा जब यहा रोम के सैनिक दिखायी दे रहे है तो इस खंडहर का होना भी लाजमी है, लेकिन ऐसा नही था क्योंकि तभी प्रो सरताज ने मुझे पुकारा और बोला मिश्रा जी ये देखिये, क्या बनाया है, मैने कहा, बनाया है? किसने?
और तब मैने देखा कि जो मेरी नज़रो के सामने थी वो चीज प्राकृतिक होते हुए भी अप्राकृतिक और आश्चर्यजनक थी,
पता चला कि अभी अभी इसका अनावरण किया गया है और ये खंडहर नहीं ! ये है, एक पुनर्निर्माण! जिसका रचयिता हमारे सामने अपनी रचना को स्थापित किये हुए था

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Venice Tour : सपने सच होते हैं

December 15, 2005 · No Comments

सपने सच होते हैं
हम प्रातः 7 बजे हम वेनिस (इटली) के रेलवे स्टेशन पर उतरे, सूरज की

किरणों की प्रतीक्षा मे हम बाहर निकले, सर्दी बहुत ठीक परंतु बाहर जाकर देखा तो तेज बारिश हो रही थी प्लेटफार्म के बाहर न सडक थी न ही मोटर गाडी बस एक समन्दर की धारा और उसमे चलते स्टीमर


आंखे जैसे पलक मारने को तैयार ही नही थी, उन्हे यकीन नही हो रहा था कि किसी शहर मे सारी सड्को और गलियों मेन आवागमन पानी पर होता है, आज जब ये सपना सच हुआ तो खुद को विश्वाश ही नही हुआ

बात बहुत पुरानी है, और ये सपना भी बहुत पुराना है, जब हम अपनी 11वीं कक्षा मे थे और हमारे अंग्रेजी शिक्षक एक कहानी सुना रहे थे जिसका शीर्षक था Merchant of Venice मैने उसे बहुत ध्यान से सुना और कई बार पढा भी. उस किताब मे वेनिस का पूर्ण् विवरण और व्यापार की कहानी थी, जहां के लोगों की दिनचर्या का हर कार्य पनी और नाव से जुडा है, घर के दरवाजे पर समन्दर की लहरे दस्तक देती रह्ती हैं

किताब पढने के बाद मेरी आंखो ने एक सपना देखा कि काश मै ये शहर देख पाता कि ऎसा भी हो सकता है क्या ? और फिर एक दिन हम इटली मे थे, और हमने एक शनिवार को अपनी वेनिस यात्रा शुरू की

रात के 9 बजे प्रारम्भ करके हम सुबह 7 बजे हम वेनिस पहुंच गये, बारिश तेज थी, ज्यों ही हम स्टीमर की ओर बढे और……………………… जारी, अगली प्रविष्टि में…………..

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